हिंदुस्तान में जब भी सिनेमा जगत के पहले “सुपरस्टार” का ज़िक्र होगा तब सर्वप्रथम “दिलीप कुमार” का ही नाम लिया जाएगा। अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान और अनिल कपूर जैसे बड़े अभिनेता इन्हें अपना आदर्श मानते हैं और यहाँ तक कि शाहरुख खान ने इन्हें अपने “पिता” का दर्जा दिया है।

अपने शानदार अभिनय की वजह से भारत से लेकर पाकिस्तान की जनता के बीच अपनी छाप छोड़ने वाले “दिलीप कुमार” ने 98 साल की उम्र में 7 जुलाई 2021 को हमेशा के लिए दुनिया का दामन छोड़ दिया है और इसी के साथ भारतीय सिनेमा जगत में एक “दौर” की समाप्ति हुई।
इस दुःखद खबर का असर सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पाकिस्तान की जनता पर भी है। यही वजह है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिलीप कुमार की पत्नी सायरा बानो से फोन पर बात करके अपनी संवेदना प्रकट की तो दूसरी ओर पड़ोसी देश पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने ट्वीट करके इस खबर पर अपना शोक प्रकट किया।
बात करें दिलीप कुमार के शुरुआती दौर के बारे में तो इनका जन्म 11 दिसम्बर 1922 पाकिस्तान के पेशावर में एक समृद्ध परिवार में “मोहम्मद यूसुफ खान” के नाम से हुआ था। इनकी माता का नाम “आएशा बेगम” तथा पिता ‘लाल गुलाम सावर खान” थे जो कि फलों के बड़े कारोबारी थे। दिलीप कुमार के 12 भाई-बहन थे और घर में किसी को कोई चीज़ की कमी नहीं थी।
1930 में इनके पिता जी मुंबई आए और अपने कारोबार को आगे बढ़ाया तो वहीं दिलीप कुमार की शुरुआती पढ़ाई नासिक के “बार्न्स” स्कूल से होने लगी। इसी बीच पिता जी के साथ इनके सम्बन्धों में खटास पैदा होने लगी जिसका नतीजा यह रहा कि उन्होंने अपना घर छोड़ दिया और महाराष्ट्र आ गए और यहाँ से शुरू होता है इनके जीवन का संघर्ष।

दिलीप कुमार का संघर्ष
साल 1940 में अब महाराष्ट्र आने के बाद उन्हें अपने भरण-पोषण करने के लिए काम की ज़रूरत थी। तभी उनको एक “पारसी कैफे” के मालिक ने अपने यहाँ शरण दी। अच्छे ज्ञान तथा अंग्रेजी आने की वजह से उस कैफे के मालिक ने इनकी मदद की और “आर्मी क्लब” में इन्हें काम दिलवाया जहाँ दिलीप कुमार ने “सैंडविच” बेचने का कार्य शुरू किया।
यहाँ इन्होंने ढाई से तीन साल तक काम किया और पांच हज़ार रुपए कमा लिए। इसके बाद 1943 में वह वापस मुंबई अपने पिता जी के पास आ गए और सारे गिले-शिकवे दूर करके फिर से अच्छे संबन्ध स्थापित कर लिए। साथ ही एक चर्च के स्टेशन में डॉ० मसानी से इनकी मुलाकात होती है।
इन्होंने दिलीप कुमार को “बॉम्बे टॉकीज” चलने को कहा और यह तैयार हो गए। अब यहीं से इनके फिल्मी दौर की शुरुआत होती है। बात करते हैं शानदार फिल्मी सफर के बारे में तो 22 साल की उम्र में इनकी पहली फिल्म जो कि बॉम्बे टॉकीज द्वारा निर्मित “ज्वार भाटा” पर्दे पर आई। लेकिन इस फिल्म को जनता का प्यार तो नहीं मिला मगर इनके अभिनय को खूब सराहा गया।
इसके बाद भारत के आज़ादी के समय 1947 में आई फिल्म “जुगनू” और 1948 में “मेला” इन सभी फिल्मों को ठीक-ठाक ही जनता का समर्थन मिला था। लेकिन अभी तक ऐसी कोई फिल्म नहीं आई थी जो जनता के द्वारा खूब पसन्द की जाए और तभी “मेहबूब खान” जो कि एक बड़े फिल्म निर्माता हैं जिन्होंने “मदर इंडिया” जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्म को बनाया, उनके साथ काम करने का मौका दिलीप कुमार को मिलता है।
फिल्म अंदाज के बाद दिलीप कुमार ने जनता के बीच अपनी जगह बनाई
इस फिल्म का नाम “अंदाज़” था जो कि 1949 में आई थी। जिसमें नर्गिस, राजकपूर और दिलीप कुमार जैसे तीन महान कलाकार शामिल थे जिसका नतीजा यह रहा कि यह फिल्म सुपर हिट साबित हुई और इसी के बाद से दिलीप कुमार ने जनता के बीच अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया। इसके बाद इनकी आई सारी फिल्म जैसे शबनम, दाग, उड़न खटोला और 1955 में आई देवदास जिसने दिलीप कुमार को एक अलग ही मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया।
1950 के बाद से यह बड़े कलाकारों में शुमार हो गए थे और यही वजह थी कि उस दौर में उनको एक फिल्म के लिए एक लाख रुपए मिलते थे जो कि आज के समय में लगभग 1 करोड़ के समान होंगे। इसके बाद 1960 का दौर आता है और तभी पर्दे पर आती है “मुग़ले आज़म” जिसने एकदम से सिनेमा जगत और जनता के बीच कोहराम मचा दिया था।
इस फिल्म को कई सालों तक जनता का प्यार मिलता रहा और इतना पैसा कमाया था जो वर्तमान समय में इसकी तुलना करें तो लगभग 1 हज़ार से 2 हज़ार करोड़ के बीच इस फिल्म ने कमाई की थी। इसी के साथ अब भारतीय सिनेमा तेज़ी से उबर रहा था। एक के बाद एक इनकी फिल्म हिट हो रही थी जिसकी वजह से इनको “हॉलीवुड” से भी फिल्मों में काम करने ऑफर दिया गया, मगर दिलीप कुमार ने साफ मना कर दिया।

दिलीप कुमार से “ट्रेजिडी किंग”
फिल्मों के शुरुआती दौर में यह बॉम्बे टॉकीज की मालकिन “देविका रानी” से मिले। उन्होंने मोहम्मद यूसफ़ खान के बदले “दिलीप कुमार” नाम रखने को कहा और उनके कहने पर मोहम्मद यूसुफ खान से दिलीप कुमार बन गए। बाद में इनको जनता का खूब प्यार मिल रहा था और यही वजह थी कि उन्हें “ट्रेजिडी किंग” के नाम से जाना जाने लगा।
इसके पीछे वजह यह थी कि अधिकतर फिल्मों में यह “दिल टूटे आशिक” का रोल निभाया करते थे और दिल जीतने वाली ऐसी एक्टिंग कर देते थे जिसे लोग काफी पसन्द करते थे। यही वजह थी कि इनको “ट्रेजिडी किंग” के नाम से जाना जाने लगा।
फिल्मी कैरियर का ग्राफ नीचे जाने लगा
कहते हैं जब कोई नई चीज़ आती है तो वह पुरानी चीज़ की जगह पर अपना हक जमा लेती है। यही वजह थी कि बॉलीवुड में अब शाहरुख खान, अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना जैसे युवा कलाकार आ चुके थे और दर्शक उन्हें काफी पसन्द कर रहे थे। तो दूसरी ओर दिलीप कुमार को अभी भी फिल्मों में काम मिल रहा था लेकिन “हीरो” का नहीं।
फिल्म “शक्ति” आई जिसमें अमिताभ बच्चन और दिलीप कुमार दोनों साथ में दिखे। 1984 में अनिल कपूर के साथ “मशाल” में काम किया। 1993 में इनको “फिल्मफ़ेयर लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड” मिलता है। इनकी अंतिम फिल्म 1998 में “किला” आई और साल 2000 में यह फिल्मों की दुनिया से रिटायर हो जाते हैं।

जीवन के प्रेम प्रसंग
वैसे तो कई अभिनेत्रियों के साथ दिलीप कुमार का नाम जुड़ा है लेकिन इसकी शुरुआत फिल्म मुग़ले आज़म के बाद से होती है। उस वक्त दिलीप कुमार और अभिनेत्री मधुबाला के प्रेम प्रसंग के चर्चे खूब हो रहे थे।
करीब 7 साल तक यह दोनो एक साथ रहे। मगर सवाल यह है कि आखिर इनकी शादी क्यों नहीं हो पाई? इसका जवाब जब मधुबाला ने से मांगा गया तो उनका कहना था कि उनके पिता जी और दिलीप कुमार के बीच “अहंकार” रोड़ा बना था। दोनों ही अपने इस अहंवाद को छोड़ने को तैयार नहीं थे जिसके चलते इनकी शादी एक-दूसरे से नहीं हो पाई।
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इसके बाद अभिनेत्री बैजंती माला के साथ इनका नाम जुड़ा। लेकिन 1966 में इनकी शादी अभिनेत्री सायरा बानो से होती है जो कि इनसे 22 साल छोटी हैं। इनकी कोई संतान नहीं है और आज तक यह दोनों एक-दूसरे का साथ निभाते आ रहे थे लेकिन अब दिलीप कुमार का साथ यहीं तक था।

उनके जीवन के बारे कुछ अन्य जानकारी
इसके अलावा इनके जीवन के बारे कुछ अन्य जानकारी भी हैं जो कि इनकी जीवनी में बताया गया है। जैसे इनको क्रिकेट का बहुत शौक था। इसके अलावा सबसे भारतीय अभिनेताओं में सबसे अधिक अवार्ड पाने की वजह से इनका नाम “गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड” में दर्ज है।
1991 में “पद्म भूषण”, 1994 में “दादा साहेब फाल्के पुरस्कार” और 2015 में “पद्म विभूषण” पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सिर्फ भारत में नहीं पाकिस्तान में भी वहाँ के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार “निशान-ए-इम्तियाज़” से नवाज़ा गया। 2000-2006 तक कांग्रेस पार्टी ने इन्हें राज्य सभा का सदस्य नामित किया था।
इन सबके अलावा यह दान देने का कार्य बहुत अधिक किया करते थे। मगर आज भारतीय सिनेमा जगत ने एक ऐसे हीरे को खो दिया है जिसकी भरपाई कर पाना मुश्किल है। भगवान उनके परिवार को शक्ति तथा आत्मा को शांति प्रदान करे।
-यशस्वी सिंह