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October 30, 2026
विचार

अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्ज़ा, तालिबानी सोच का खात्मा जरूरी

अफगानिस्तान में 1996 से 2001 तक तानाशाही, क्रूरता, मानवाधिकारों का हनन और महिलाओं पर तमाम पाबंदी के साथ अत्याचार करने वाले तालिबान राज की याद से ही लोगों में दहशत भर जाती है। तालिबानी राज में जुल्मों से तंग आकर भारत सहित अन्य देशों में शरण लेने वाले अफगानी नागरिक आज भी उन जुल्मों को याद करते हुए कांप उठते हैं।

महिलाओं पर तो तालिबानियों ने जुल्म की इंतिहा कर दी थी। बुर्का पहनने को मजबूर महिलाओं का रोजगार छीन लिया गया। उनके पढ़ने पर पाबंदी लगा दी गई। बिना मर्द के उनके घर से बाहर निकलने पर पाबंदी लगा दी गई। तालिबानी राज में किसी के मानवाधिकार की बात ही नहीं हो सकती थी।

अफगानिस्तान तालिबान

इस्लाम का कानून सबके लिए होगा सर्वोपरि

अब फिर से अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा होने के बाद महिलाओं को गुलाम बनाने की बात हो रही है। तालिबानी लड़ाकों के साथ कम आयु की लड़कियों की जबरन शादी कराने के लिए सूची बन रही है। विधवाओं को भी निकाह के लिए मजबूर किया जाएगा। तालिबान के बड़े नेताओं के अफगानिस्तान लौटने के साथ ही यह साफ कर दिया गया है कि अफगानिस्तान में इस्लामिक कानून चलेगा। यह साफ कर दिया गया है कि अफगानिस्तान में लोकतंत्र नहीं होगा।

तालिबानी नेताओं ने ऐलान कर दिया है कि लोगों को शरीयत के अनुसार ही चलना होगा। इस्लाम का कानून सबके लिए सर्वोपरि होगा। महिलाओं का फैसला तालिबान के धार्मिक नेताओं पर छोड़ दिया गया है। कहा जा रहा है कि अफगानिस्तान में महिलाओं की किस्मत अब मुस्लिम धार्मिक नेता तय करेंगे। यह समझ से परे है कि तालिबान के इस्लामिक राज कायम करने के ऐलान के बाद अफगानिस्तानी नागरिक देश छोड़कर क्यों भाग रहे हैं।

हैरानी की बात तो यह है कि पूरी दुनिया में तालिबानियों के जुल्मों के किस्से मीडिया और सोशल मीडिया में छाये हुए हैं, पर भारत में एक वर्ग तालिबानियों के अफगानिस्तान में 20 वर्षों बाद फिर से कब्जे को लेकर खुशी जता रहा है। इनमें तथाकथित बुद्धिजीवी महिलाएं भी हैं। यह अच्छे संकेत हैं कि ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने तालिबानी राज को लेकर नाराजगी जताई है।

दुनिया के तमाम देशों में तालिबान के खिलाफ हो रहे हैं प्रदर्शन

भारत में तालिबान के समर्थन में खड़े होने वाले लोग एक तरफ तो देश में मानवाधिकारों के हनन को लेकर दुनियाभर में हो-हल्ला मचाते हैं और दूसरी तरफ लोकतंत्र को नकराने वाले तालिबान का समर्थन कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के संभल से समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे को आजादी की लड़ाई बता दिया।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता मौलाना सज्जाद नोमानी ने तालिबान की जीत पर खुशी जाहिर करते हुए भारतीय मुसलमानों की तरफ से सलाम भी भेजा। शफीकुर्रहमान बर्क के खिलाफ पुलिस में राजद्रोह का मुकदमा दर्ज कराया गया है। ये तो चंद उदाहरण हैं। भारत में रहकर देशविरोधी बयान देने वालों की कमी नहीं है।

Anti Taliban Protest

भारत में मानवाधिकारों के हनन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदी और अल्पसंख्यकों पर कथित अत्याचारों को लेकर झंडा बुलंद करने वालों की तालिबानी सोच की असलियत तो अफगानिस्तान में भारतीय पत्रकार दानिश सिद्दिकी की क्रूर हत्या से सामने आ गई थी।

दानिश सिद्दिकी की निर्मम हत्या पर शोक जताने वाले लोग, तालिबानी क्रूरता पर चुप्पी साधे रहे। अफगानिस्तान में भारतीय फोटो जर्नलिस्ट दानिश सिद्दिकी की हत्या के बाद यह खुलासा हुआ था कि हत्या से पहले उसे बुरी तरह यातनाएं दी गईं थी। हत्या के बाद उसके शव को भारी वाहन से कुचला गया था। उसके शव को घसीटा भी गया था। दानिश को 12 गोलियां मारी गई थी।

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तालिबानियों ने पत्रकार दानिश सिद्दिकी को बेरहमी से मार डाला

भारत में नागरिकता संशोधन कानून और NRC के विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान दानिश सिद्दिकी के कुछ फोटो चर्चा में आए थे। CAA विरोधियों ने सिद्दिकी के फोटो के पोस्टर भी बनाए थे। उसी सिद्दिकी को अफगानिस्तान में तालिबानियों ने काफिर कहकर बेरहमी से मार डाला था। सिद्दिकी की बेरहमी से की गई हत्या का खुलासा होने के बावजूद उसके हमदर्दों ने तालिबान के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया।

कश्मीर में छोटी-छोटी घटनाओं को लेकर शोर मचाने वाले संगठन दानिश की हत्या पर चुप्पी साधे रहे। अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठन भी चुप हो गए। अफगानिस्तान में मीडिया संस्थानों पर पूरी तरह रोक लगा दी गई। महिला पत्रकारों को घरों से बाहर न निकलने की हिदायत दी गई है।

तालिबानियों का अतीत तो इस्लामिक कट्टरता और जुल्मों का रहा है। किस तरह अवैध धंधों की आड़ में तालिबानियों ने पैसा बटोरा, यह भी दुनिया के सामने आ चुका है। जिस तरह से अफगानिस्तानियों को झूठा भरोसा दिलाकर तालिबान ने फिर से कब्जा किया है, उसकी असलियत भी अफगानी नागरिकों में दहशत और देश से भागने की मारामारी से उजागर हो गई है।

तालिबान लोकतंत्र को कुचल कर राज करेंगे, यह भी ऐलान कर दिया गया है। इसके बावजूद भारत में एक वर्ग खुलकर तालिबान का समर्थन कर रहा है। तालिबानी सोच की मानसिकता वाले लोगों का मानवाधिकारों के हनन का आरोप भी एक ढोंग है और यह सब एक साजिश के तहत किया जा रहा है।

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