पपीते की खेती किसानों के लिए लाभकारी है। कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को इसके प्रति जागरूक करने का बीड़ा उठाया है। मेरठ के सरदार वल्लभभाई पटेल यूनिवर्सिटी ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी और इससे संबद्ध कृषि विज्ञान केंद्रों के वैज्ञानिकों ने इस दिशा में काम शुरू कर दिया है। इसके सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं।

कृषि विश्वविद्यालय के प्रो. आरएस सेंगर ने बताया कि भारत में अधिकांश हिस्सों में पपीते की खेती होती है। इस फल को कच्चा और पकाकर, दोनों तरीके से उपयोग में लाया जाता है। इस फल में विटामिन ए की मात्रा अच्छी पाई जाती है, वहीं पर्याप्त मात्रा में इसमें पानी भी होता है, जो त्वचा को नम बनाए रखने में सहायक है।
अगर इसकी उन्नत तरीके से खेती की जाए तो कम लागत पर अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। इसकी खेती के साथ इसकी अंतःवर्तीय फसलों को भी बोया जा सकता है, जिनमें दलहनी फसल जैसे मटर, मैथी, चना, फ्रेंचबीन व सोयाबीन आदि हैं। अब इसकी खेती पूरे भारत में की जाने लगी है।
सालों-साल आसानी से मिलने वाला पपीता बहुत ही फायदेमंद फल है और आज के समय में पपीता ज्यादातर लोगों की पसंद भी है, क्योंकि यह ऐसा गुणकारी फल है जो पेट की अनेक समस्याओं को दूर करता है। इसकी खेती करना भी आसान है।
कम समय में अच्छा-खासा मुनाफा देने वाली फसल हैं। शौकिया तौर पर लोग सालों-साल अपने घर के बगीचे में भी लगाते आए हैं या खाली पड़ी आस-पास की जगह पर इसे उगाकर फायदा लेते रहे हैं।
किसानों को सरकार दे रही अनुदान
प्रो. आरएस सेंगर ने बताया कि आज के दौर में अनेक किसान पपीते की खेती कर के अपने आपको प्रगतिशील किसानों की दौड़ में शामिल कर चुके हैं, क्योंकि इसे उगाना आसान, बेचना आसान और मुनाफा ज्यादा है।
सघन बागबानी पपीता उत्पादकों के लिए एक नई विधि है, जिसे अपना कर किसान उत्पादकता और अपनी आमदनी में इजाफा कर सकते हैं। इस विधि का इस्तेमाल पपीता उत्पादकों द्वारा किया जाने लगा है, लेकिन अभी भी अनेक पपीता उगाने वाले किसान इस विधि से अनजान हैं।

बताया कि सघन बागबानी तकनीक में पौध की प्रति इकाई संख्या बढ़ा कर जमीन का ज्यादा से ज्यादा उपयोग किया जाता है जिससे अधिक पैदावार ली जा सके। पपीते की कुछ किस्मों के पौधे बौने होते हैं, जो सघन बागबानी के लिए उत्तम हैं।
दिन प्रतिदिन खेती की जोत कम होती जा रही है। ऐसे में पपीते की सघन बागबानी पैदावार बढ़ाने के लिए एक खास तरीका है। पपीते का इस्तेमाल कच्चे व पके फल के रूप में किया जाता है।
इसके अलावा इससे मिलने वाला पपेन का भी इस्तेमाल अनेक औद्योगिक कामों में किया जाता है। खेत में यदि ड्रिप इरिगेशन यानी बूंद-बूंद सिंचाई की विधि से पानी दिया जाता है तो इससे पानी सीधे पौधे की जड़ों में जाता है और बर्बाद नहीं होता।
इस पद्धति से खेती करने पर सरकार आम किसानों को 50 फीसदी अनुदान और एसटी और एससी, लघु, सीमांत और महिला किसानों को 50 फीसदी अनुदान देती है। बूंद-बूंद सिंचाई में सिर्फ पौधे की जड़ों में पानी जा रहा है। इस से तकरीबन 85 फीसदी पानी की बचत होती है।
पपीते की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु
इसकी खेती गर्म नमी युक्त जलवायु में की जा सकती है। इसे अधिकतम 38 से 44 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान पर उगाया जा सकता है। इसके साथ ही न्यूनतम 5 डिग्री सेल्सियस से तापमान कम नहीं होना चाहिए।
पपीते को लू और पाले से भी बहुत नुकसान होता है। इसकी खेती साल के बारहों महीने की जा सकती है। लेकिन फरवरी, मार्च व अक्टूबर के मध्य का समय उपयुक्त माना जाता है। इन महीनों में उगाए गए पपीते की बढ़वार काफी अच्छी होती है।
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पपीते की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी
पपीता बहुत ही जल्दी बढ़ने वाला पेड़ है, इसलिए इसे साधारण ज़मीन, थोड़ी गर्मी और अच्छी धूप मिलना अच्छा होता है। इसकी खेती के लिए 6.5-7.5 पीएच मान वाली हल्की दोमट या दोमट मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है, जिसमें जल निकास की अच्छी व्यवस्था हो।
पपीते की उन्नत किस्में
इनमें पूसा डोलसियरा, पूसा मेजेस्टी, रेड लेडी 786 (संकर किस्म) शामिल है। पपीते की उन्नत किस्मों से प्रति पौधे 35 से 50 किलोग्राम उपज मिल जाती है। पपीते का एक स्वस्थ पेड़ एक सीजन में करीब 40 किलो तक फल देता है।
पपीते की फसल में विषाणु रोग प्रबंधन
बागवानी में अधिक लाभ की दृष्टि से पपीते की फसल अति लाभकारी है किंतु पपीते की फसल में विषाणु एक प्रमुख समस्या है जिसके जानकारी के अभाव में किसानों को बहुत आर्थिक क्षति उठाना पड़ता है। यदि समय रहते इनका प्रबंधन न किया गया तो किसान को भारी नुकसान उठाना पड़ता है।
रिंग स्पॉट वायरस: इस रोग का कारण विषाणु है जो कि माहू द्वारा फैलता है जिसके कारण पौधे की वृद्धि रुक जाती है पत्ती कटी फटी हो जाती है एवं हर गाठ पर कटे-फटे पत्ते निकलते हैं। पत्ती, तनो एवं फलों पर गोलाकार धब्बे बन जाते हैं। परिणामस्वरूप फल एवं पौध वृद्धि प्रभावित होता है इस रोग के गंभीर आक्रमण की स्थिति में 50-60 प्रतिशत तक हानि हो जाती है।
विषाणु पर नियंत्रण: बागों में साफ सफाई रखें। शाम को खेत में धुआं करें। रोग ग्रस्त पौधे को उखाड़ कर जला दें। पपीते के बगीचे के आसपास कद्दू वर्गीय कुल के पौधे नहीं होने चाहिए। नीम सीड कर्नल अर्क या नीम के तेल का प्रयोग 10 से 15 दिन के अंतराल पर करते रहें। माहू के नियंत्रण के लिए डाईमेथोएट दवा 0.1 प्रतिशत प्रयोग करें। वर्षा ऋतु की समाप्ति के बाद बाग लगाने पर यह रोग कम दिखाई देता है।
लीफकर्ल विषाणु रोग: यह भी विषाणु जनित रोग है जो कि सफेद मक्खी के द्वारा फैलता है जिस कारण पत्तियाँ मुड़ जाती है इस रोग से 70-80 प्रतिषत तक नुकसान हो जाता है।
नियंत्रण: स्वस्थ पौधो का रोपण करें। शाम को खेत के आसपास धुआं करें। रोगी पौधों को उखाड़कर खेत से दूर गढढे में दबाकर नष्ट करें। सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु नीम का तेल 0.2 प्रतिशत 5-7 दिन के अंतराल पर या इमिडाक्लोपरिड कीटनाशक 0.1 प्रतिशतका प्रयोग करें। पाउडरी मिल्ड्यू रोग की रोकथाम के लिए हेक्सास्टॉप की 300 ग्राम प्रति एकड़ मात्रा उपयुक्त रहती है।