नई दिल्ली: छठ महापर्व की शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को ‘नहाय-खाय‘ से होती है। इस दिन व्रत करने वाले और घर के अन्य सभी सदस्य चावल-दाल और कद्दू से बने व्यंजन को प्रसाद के तौर पर ग्रहण करते हैं। छठ व्रतियों के अनुसार यहीं से अगले तीन दिनों तक चलने वाली पूजा की शारीरिक और मानसिक तैयारी है।
छठ व्रती भारती कहती हैं, “इस दिन भोजन में सेंधा नमक का उपयोग होता है। दाल में सिर्फ अरहर का उपयोग किया जाता है और इस दिन लौकी की सब्जी को काफी महत्व दिया जाता है। भोजन तैयार होने के बाद उसमें तुलसी का पत्ता डाला जाता है और पहला भोजन गाय को कराया जाता है।

आगे उन्होंने बताया कि इसके बाद ही छठ व्रती भोजन करते हैं। कई स्थानों पर रिवाज यह है कि खरना के लिए गेहूं इसी दिन सुखाया जाता है। मिथिला और भोजपूर के हिसाब से इस विधि में मोटे बदलाव होते हैं, लेकिन प्रक्रिया में एकरूपता है।
कार्तिक शुक्ल पंचमी को होता है खरना
छठ महापर्व के दूसरे दिन रसियाव-रोटी यानी खरना का रिवाज है। कार्तिक शुक्ल पंचमी को शाम मुख्य पूजा होती है। इसे ‘खरना’ कहा जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस या गुड़ से बनी खीर का भोग लगता है। कई घरों में चावल का पिट्ठा भी बनाया जाता है। जहां पूजा होती है, लोग उन घरों में जाकर प्रसाद ग्रहण करते हैं।
छठ व्रती अर्चना राय बताती हैं कि इस दिन व्रती को बिना पानी और अन्न के रहना होता है। सूरज ढलने से ठीक पहले स्नान कर व्रती सूर्य भगवान को जल चढ़ाते हैं। इसके बाद मिट्टी के बने चूल्हे पर खरना का प्रसाद तैयार होता है। प्रसाद बनाने के लिए चूल्हे में आम की लकड़ी का उपयोग होता है।
आगे उन्होंने कहा कि चूल्हे को जलाने के लिए खर (एक तरह का घास) का इस्तेमाल होता है। वैसे तो खीर सामान्य चावल से ही बनाई जाती है, लेकिन इसमें थोड़ा साठी का चावल भी मिलाया जाता है। साठी धान का एक प्रकार है, जो सभी धानों में पहले होता है। पूजा-पाठ में इसका उपयोग होता है।
व्रती के साथ-साथ सारे लोग डूबते हुए सूर्य को देते हैं अर्ध्य
महापर्व के तीसरे दिन अस्ताचलगामी सूर्य को अर्ध्यदान देने की पद्धति है। पर्व का तीसरा दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी का होता है। इस दिन शाम अस्ताचलगामी सूर्य को अर्ध्य दिया जाता है। व्रती के साथ-साथ सारे लोग डूबते हुए सूर्य को अर्ध्य देते हैं। इस दिन व्रती का घर-परिवार पूरी तरह पूजा की तैयारी में व्यस्त रहता है।
इस दिन समाज के लोग आगे बढ़कर अपनी भूमिका निभाते हैं। इस दिन कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं, जिसे सूप और डाले में सजाया जाता है। सूप और डाले की संख्या का अपना महत्व है। घाट जाने के पहले व्रती स्नान करते हैं। बिना सिला कपड़ा पहनते हैं। फिर घाट पर पहुंचकर वह नदी हो या सरोवर उसमें डुबकी लगाकर पानी में ही डूबते सूरज को अर्ध्य देते हैं। पूरी प्रक्रिया में शुद्धता का ध्यान रखा जाता है।
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चौथे दिन सुबह उगते सूर्य को अर्ध्यदान दिया जाता है। वह दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी का होता है। उगते सूर्य को अर्ध्य देने के बाद पारण के साथ व्रत की समाप्ति होती है। इस दिन घाट पर पहुंचने के बाद महिलाएं सूर्य भगवान से जल्दी उगने की अराधना करती हैं और एक साथ बैठकर गीत गाती हैं।
इसके बाद जब सूर्य देवता प्रकट होने वाले होते हैं तो व्रती हाथ में सूप लेकर जल में खड़े रहते हैं। सूर्य के उदय होते ही लोग पहले दूध और फिर जल से अर्ध्य देते हैं। इस दौरान गीतों का दौर निरंतर चलता रहता है। उगते सूर्य भगवान को अर्ध्य देने के साथ ही चार दिनों तक चलने वाला छठ महापर्व संपन्न होता है।