दीपावली के दिन जिमीकंद की सब्जी खाने की परम्परा है। इसे सूरन (जिमीकंद) कहीं ओल और कहीं कांद भी बोलते हैं। दीपावली के तीन-चार दिन पहले से ही बाजार में हर सब्जी वाला इसे जरूर रखता है। लखनऊ की सब्जी बाजारों आजकल जिमीकंद दिखाई पड़ रहा है। प्राचीन काल में ऋषि-मुनि जंगलों में रहते हुए कंदमूल ही खाकर ही सौ वर्षो तक स्वस्थ जीवन जीते थे।

चूंकि यह सब्जी देखने में भी नहीं सुहाती है और खाने पर गले में चिनचिनाती है। लेकिन चूंकि दीपावली पर यही सब्जी बनती थी तो इसे खाना ही पड़ता था । बड़े बोलते थे कि आज के दिन जिमीकंद नहीं खायेगा अगले जन्म में छछुंदर का जन्म लेगा। यही सोच कर खाये जा रहे है कि छछुंदर न बन जाय। अपने से छोटों को भी जिमीकंद खाने की सीख दे रहे हैं।
सूरन की सब्जी में है कई बीमारियों से लड़ने के गुण
सब्जियों में सूरन (जिमीकंद) ही एक ऐसी सब्जी है जिसमें फास्फोरस अत्यधिक मात्रा में पाया जाता है। अब तो मेडिकल साइंस ने भी मान लिया है कि इस एक दिन हम देशी सूरन की सब्जी खा ले तो स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में महीनों फास्फोरस की कमी नहीं होगी।
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यह बवासीर से लेकर कैंसर जैसी भयंकर बीमारियों से बचाए रखता है। आयुर्वेद चिकित्सक डॉ. अजय शर्मा ने बताया कि इसमें फाइबर, विटामिन सी, विटामिन बी6, विटामिन बी1 और फोलिक एसिड होता है। साथ ही इसमें पोटेशियम, आयरन, मैग्नीशियम और कैल्शियम भी पाया जाता है।
पता कि ये परंपरा कब से चल रही है लेकिन सही कि हमारे लोक परम्पराओं में भी वैज्ञानिकता छुपी हुई होती थी। पूर्वजों ने विज्ञान को हमारी परम्पराओं, रीतियों और संस्कारों में पिरो दिया। जो खुशी के साथ हमे स्वास्थ्य भी प्रदान करती है।