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October 30, 2026
Dustak Special

जितना बड़ा संघर्ष, जीत उतनी ही शानदार होगी : स्वामी विवेकानन्द

एक ऐसी शख्सियत जिसने पूरी दुनिया को वेदों की ताकत दिखाई, और हिंदुस्तान का मान-सम्मान बढ़ाने का कार्य किया, ऐसे थे भारत के महान ज्ञानी “स्वामी विवेकानन्द“। उन्होंने  कठोर तपस्या की जिसके चलते भगवान उनको दर्शन दिया करते थे और कई बार उन्होंने ईश्वर से वार्तालाप भी किया है।

बात करते हैं इनके शुरुआती दिनों के बारे में तो स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता के एक समृद्ध परिवार में हुआ था। इनके माता-पिता विश्वनाथ दत्ता और भुवनेश्वरी देवी थे। शुरू से ही इनके घर में धार्मिक कार्य होते रहते थे जिसकी वजह से इनकी भी रुचि रामायण तथा धार्मिक कथाओं की तरफ बढ़ गई और यह भगवान राम को अपना आदर्श मानने लगे थे।

स्वामी विवेकानन्द

बचपन में इनका नाम “नरेंद्रनाथ दत्त” था और ये जानवरों से बहुत अधिक प्रेम करते थे। पढ़ाई के क्षेत्र में यह काफी होशियार थे और शिक्षक इन्हें काफी पसन्द  किया करते थे। 1879 में इन्होंने अपने कालेज की पढ़ाई पूरी की और जब ये  प्रेसिडेंसी कालेज में गए तो वहाँ से “ब्रह्म समाज” को मानने लगते हैं।

स्वामी विवेकानन्द जीवन की कड़ी रामकृष्ण परमहंस से कैसे जुड़ी?

रामकृष्ण परमहंस बहुत ही धर्मिक व्यक्ति थे। इनके स्वप्न में भगवान इनको दर्शन दिया करते थे। साथ ही इन्होंने कठोर तपस्या करके माँ काली को प्रसन्न किया था। तभी एक दिन ये साधना में विलीन थे और इनको भगवान विष्णु के दर्शन होते हैं और उन्होंने कहा कि बहुत जल्द मैं आने वाला हूँ।

जब परमहंस स्वामी विवेकानन्द से मिले तो उनको यह महसूस हुआ कि यही है वो इंसान जो भगवान के रूप में जन्मा है। वह विवेकानन्द को इस बात से अवगत कराते हैं कि उनका जन्म लेने का उद्देश्य समाज को नई दिशा दिखाना है और भगवान ने उन्हें अपना आशीर्वाद देकर भेजा है, लेकिन विवेकानन्द इस बात को नहीं मानते हैं।

इसके बाद परमहंस ने अपनी साधना से विवेकानन्द के दिमाग को जोड़ कर भगवान का ऐसा रूप दिखाया कि उनको अपने जीवन का महत्व समझ आ गया। मगर उसके बाद होती है इनके संघर्ष की शुरुआत। इनके पिता जी समाज के लिए कार्य किया करते थे जिसकी वजह से इनके पास अधिक पूंजी नहीं थी। इसी बीच विवेकानन्द के पिता जी का देहांत हो जाता है और यहाँ से इनके संघर्ष के दिन शुरू हो जाते हैं।

इन्होंने भयानक गरीबी के दिन देखने शुरू किए। इनके पास पहनने को कपड़ा नहीं होता तो फटे कपड़े पहन कर अपना गुज़ारा कर रहे थे। दूसरी ओर दिन में दो बार का भोजन भी नसीब नहीं हो रहा था और नौबत यहाँ तक आ गई थी कि दो-दो दिन तक विवेकानन्द भूखे रहते थे। लेकिन इसके बाद इन्होंने ठाना कि वे भगवान को प्राप्त करेंगे।

कैसे हुए स्वामी विवेकानन्द को भगवान के दर्शन?

गरीबी झेलने के दौरान वह रामकृष्ण परमहंस की शरण में जाते हैं और घोर तपस्या करने लगते हैं। लगातार एक-दो सप्ताह तक साधना में ही विलीन हो जाते थे और काफी कठिन परिश्रम के बाद एक दिन उनको भगवान के दर्शन होते हैं। इसके बाद वह वेदों को पढ़ते हैं और इतने ज्ञानी हो जाते हैं जिसकी कल्पना शायद उन्होंने भी नहीं की थी।

इन सबके बीच रामकृष्ण परमहंस की जिंदगी के अंतिम दिन चल रहे थे और उन्होंने विवेकानन्द से अपनी अंतिम ख्वाहिश बताई और कहा कि अब समय आ गया है कि तुम देश के युवाओं को हिंदुत्व के बारे में बताओ और उनको सही दिशा में ले जाने का कार्य करो। इतना कहने के बाद वे समाधि ले लेते हैं और चन्द दिनों बाद उनको मोक्ष प्राप्त हो जाता है।

कैसे बने नरेंद्रनाथ दत्त से स्वामी विवेकानन्द?

उनके गुरु के देहांत के बाद नरेंद्रदत्त काफी साधना करते हैं और बेहिसाब ज्ञान अर्जित करते हैं। वह अपना जीवन एक संन्यासी के रूप में बिताने लगे और उन्होंने ने सोचा कि अब भारत के युवा वर्ग को सही मार्ग पर लाने का समय हो चुका है।

इस वजह से वह इस बदलाव की यात्रा शुरू करते हैं और धीरे-धीरे उनके शिष्य बढ़ते जाते हैं। उन्हीं में से एक थे राजा “अजित सिंह” जिन्होंने नरेंद्रनाथदत्त से स्वामी विवेकानन्द का नाम दिया था। इसके बाद वह हिमालय से कन्याकुमारी तक जाते हैं और लोगों को वेदों का ज्ञान देते रहते हैं।

साथ ही पूरे भारत घूमने के बाद उन्होंने विदेश जाने की यात्रा आरंभ की और अपनी पहली विदेश यात्रा 1893 में अमेरिका के वर्ल्ड कांफ्रेंस इन शिकागो में शिरकत करने के लिए गए। वह गए तो जुलाई में थे मगर कांफ़्रेस दो महीने बढ़ाकर सितम्बर में कराने का फैसला किया गया।

ऐसे में उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं थे जिससे वह दो महीनों तक अपना गुज़ारा अमेरिका में कर सकें। लेकिन कुछ अमरीकी लोग उन्हें अपने घर ले आते हैं और उनके रहने का पूरा जिम्मा सम्भालते हैं। समय बीतता है और सितम्बर में वर्ल्ड कांफ्रेंस का आगाज़ होता है। यहाँ हर धर्म के प्रतिनिधि आए थे और बारी स्वामी विवेकानन्द की आई तो उन्होंने अपना भाषण देना शुरू किया।

कैसे भारतीय युवा वर्ग को जगाने का कार्य किया?

इसमें उन्होंने कहा कि हम सभी को एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए तथा इंसानियत को हमेशा ऊपर रखना चाहिए और जब इनका भाषण खत्म होता है तो तालियों की ज़ोरदार गड़गड़ाहट यह दर्शा रही थी कि स्वामी विवेकानन्द अब इतिहास के पन्नों में जल्द ही अपना नाम दर्ज कराने वाले हैं और अमरीकी लोग उनके मुरीद हो जाते हैं।

इसके बाद वह इंग्लैंड, श्रीलंका, जर्मनी, फ्रांस सहित पूरी दुनिया  में वेद तथा ज्ञानवर्धक बातों का ज्ञान देकर वापस भारत आते हैं तो यहाँ इनका शानदार तरीके से स्वागत होता है।

हिंदुस्तान आने के बाद उन्होंने देखा कि हमारे देश का युवा कहीं ना कहीं अन्य देशों के मुकाबले पीछे है। जिसकी वजह से विवेकानन्द ने अपने शिष्यों को हर राज्य में जाने को कहा और सभी युवा वर्ग को वेद, तथा भारतीय संस्कृति के बारे में बताने को कहा। वहीं उन्होंने अपनी सबसे खास शिष्या “भगिनी निवेदिता” से कहा मेरे जाने के बाद तुम्हें भारतीय लोगों को सही मार्ग दिखाने का कार्य करना है।

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जब स्वामी विवेकानन्द को हुई मोक्ष की प्राप्ति:

इन्होंने इतनी अधिक यात्रा कर ली थी कि वह थकान से परिपूर्ण थे। साथ ही उनके स्वास्थ्य में भी गिरावट हो रही थी और वह दिन-प्रतिदिन कमज़ोर होते जा रहे थे। लेकिन वह ध्यान में इतने विलीन हो जाते कि उनको मंत्र का उच्चारण करके जगाना पड़ता था।

उनको यह पहले ही आभास हो गया था कि अब उनका जीवन ज्यादा शेष नहीं है और एक दिन अपने शिष्यों से कह कर जाते हैं कि वह समाधि में लीन होने जा रहें हैं कोई उनको जगाने का प्रयत्न नहीं करेगा।

काफी देर हो जाती है और जब उनके शिष्य उनका हाल जानने के लिए जाते हैं तो पता चलता है कि स्वामी विवेकानन्द को मोक्ष की प्राप्ति हो गई है और 1902 में उन्होंने दुनिया के हर कोने में अपने ज्ञान का परचम लहरा कर सबका साथ हमेशा के लिए छोड़ दिया। उनके जाने के बाद आज भी वह लाखों युवाओं के आदर्श माने जाते हैं। साथ ही स्वामी विवेकानन्द के विचार सदैव हमारे बीच रहेंगे और लोगों को सही मार्ग दिखाने का कार्य हमेशा करते रहेंगे।

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